प्रस्तावना
तकनीक
ने हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को
पूरी तरह बदल दिया है। बीते कुछ वर्षों में स्मार्टफोन के बाद जिस
गैजेट ने सबसे ज़्यादा
लोकप्रियता हासिल की है, वह
है स्मार्टवॉच। यह छोटी-सी
घड़ी न सिर्फ समय
बताती है बल्कि हमारे
स्वास्थ्य का पूरा लेखा-जोखा रखने का दावा करती
है। हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर, ब्लड ऑक्सीजन लेवल, नींद का पैटर्न, स्टेप
काउंट, कैलोरी बर्न और यहां तक
कि ईसीजी जैसी सुविधाएँ अब एक कलाई
पर बंधी घड़ी से मिल रही
हैं।
लेकिन,
तकनीक का दूसरा पहलू
भी होता है। हाल के कुछ शोध
और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय ने
इस पर बहस शुरू
कर दी है कि
कहीं यह “स्मार्ट” घड़ी हमारी सेहत के लिए खतरा
तो नहीं बन रही?
स्मार्टवॉच का बढ़ता क्रेज़
भारत
सहित पूरी दुनिया में स्मार्टवॉच का बाज़ार तेज़ी
से बढ़ रहा है।
रिसर्च
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत
में हर साल करोड़ों
स्मार्टवॉच बेची जा रही हैं।
युवा
पीढ़ी इसे फैशन और फिटनेस का
कॉम्बिनेशन मानती है।
कोविड-19
महामारी के दौरान जब
स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता
बढ़ी तो लोगों ने
स्मार्टवॉच को स्वास्थ्य निगरानी
का आसान साधन समझकर इसे अपनाया।
लेकिन
अब सवाल यह है कि
लगातार 24 घंटे स्मार्टवॉच पहनने से शरीर पर
क्या असर पड़ सकता है?
स्मार्टवॉच से निकलने वाला रेडिएशन
स्मार्टवॉच
ब्लूटूथ, वाई-फाई और कभी-कभी
सेल्युलर नेटवर्क पर काम करती
है। इसका मतलब है कि यह
लगातार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (EMR) छोड़ती रहती है।
रेडिएशन से संभावित खतरे:
1. थकान
और सिरदर्द – लगातार रेडिएशन के संपर्क में
रहने से थकान, चिड़चिड़ापन
और सिरदर्द जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।
2. नींद
में कमी – रेडिएशन दिमाग की प्राकृतिक नींद
की प्रक्रिया को प्रभावित कर
सकता है।
3. त्वचा
और नसों पर असर – चूँकि
घड़ी कलाई पर हमेशा चिपकी
रहती है, इससे नसों और त्वचा पर
रेडिएशन का सीधा प्रभाव
हो सकता है।
4. दीर्घकालिक खतरा – कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्षों तक ऐसे उपकरणों के लगातार उपयोग से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।
हालाँकि
यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि स्मार्टवॉच सीधे
कैंसर जैसी बीमारी का कारण बन
सकती है, लेकिन जोखिम को पूरी तरह
नज़रअंदाज़ करना भी सही नहीं
होगा।
त्वचा से जुड़ी समस्याएँ
स्मार्टवॉच
लगातार त्वचा के संपर्क में
रहती है। कई यूज़र्स को
इसकी वजह से:
एलर्जी
और खुजली होने लगती है।
पसीने
और नमी के कारण रैशेज़
या फंगल इंफेक्शन हो सकता है।
हार्ट
रेट सेंसर की LED लाइट (खासकर ग्रीन लाइट) संवेदनशील त्वचा वाले लोगों के लिए नुकसानदायक
साबित हो सकती है।
नींद पर प्रभाव
आजकल
कई लोग स्मार्टवॉच पहनकर सोते हैं ताकि नींद का डेटा ट्रैक
कर सकें। लेकिन नींद विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आदत
उल्टा नुकसान कर सकती है।
लगातार
डिवाइस का दबाव और
लाइट संकेत नींद को डिस्टर्ब करते
हैं।
नींद
का पैटर्न ट्रैक करते-करते कई लोग अनावश्यक
चिंता (Sleep
Anxiety) का शिकार हो जाते हैं।
मनोवैज्ञानिक
रूप से यह तनाव
बढ़ाता है कि “मेरी
नींद पूरी हुई या नहीं।”
मानसिक स्वास्थ्य पर असर
स्मार्टवॉच
से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता यह है कि
यह व्यक्ति को हेल्थ ऑब्सेशन
की ओर ले जा
सकती है।
हर
समय हार्ट रेट और कैलोरी पर
नज़र रखना चिंता को बढ़ाता है।
कई
युवा हर कदम गिनने
और हर कैलोरी रिकॉर्ड
करने की होड़ में
मानसिक तनाव का शिकार हो
रहे हैं।
लगातार
नोटिफिकेशन और अलर्ट से
दिमाग को आराम नहीं
मिल पाता।
बच्चों और किशोरों पर असर
बच्चों
में स्मार्टवॉच का ट्रेंड तेज़ी
से बढ़ा है। माता-पिता इसे सुरक्षा के नज़रिए से
खरीदते हैं ताकि बच्चे से संपर्क बना
रहे। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि:
बच्चों
का शरीर अभी विकसित हो रहा होता
है, ऐसे में रेडिएशन का असर ज़्यादा
हो सकता है।
छोटे
बच्चों की त्वचा को
यह एलर्जी या रैशेज़ दे
सकती है।
स्मार्टवॉच
की वजह से बच्चे भी
“हेल्थ ऑब्सेशन” या टेक्नोलॉजी ऐडिक्शन
का शिकार हो सकते हैं।
वैज्ञानिक शोध क्या कहते हैं?
कई
देशों में इस विषय पर
शोध चल रहे हैं।
अमेरिका
और यूरोप में हुई रिसर्च के मुताबिक, स्मार्टवॉच
और फिटनेस बैंड्स से निकलने वाला
रेडिएशन मोबाइल फोन से कम होता
है, लेकिन यह शरीर के
लगातार संपर्क में रहता है।
कुछ
अध्ययनों ने पाया कि
इससे हार्ट रेट वैरिएबिलिटी (HRV) प्रभावित हो सकती है।
जापान
में किए गए एक अध्ययन
में पाया गया कि लगातार स्मार्टवॉच
पहनने से कुछ लोगों
की नींद की गुणवत्ता कम
हुई।
विशेषज्ञों की राय
डॉ.
अमित वर्मा (कार्डियोलॉजिस्ट) – “स्मार्टवॉच को स्वास्थ्य निगरानी
के उपकरण के रूप में
लें, अंतिम निदान के लिए नहीं।
इसे 24 घंटे पहनना ज़रूरी नहीं है।”
डॉ.
श्वेता गुप्ता (त्वचा रोग विशेषज्ञ) – “अगर किसी की त्वचा पर
रैशेज़ या जलन हो
रही है, तो तुरंत स्मार्टवॉच
उतार दें और डॉक्टर से
सलाह लें।”
नींद
विशेषज्ञ – “नींद ट्रैकिंग करने के लिए रोज़ाना
डिवाइस पहनने की बजाय हफ्ते
में कुछ दिन पहनना बेहतर है।”
स्मार्टवॉच के फायदे भी नज़रअंदाज़ नहीं किए जा सकते
हार्ट
अटैक या अनियमित धड़कन
को पकड़ने में मदद।
बुज़ुर्गों
के लिए गिरने या इमरजेंसी अलर्ट
जैसी सुविधाएँ।
फिटनेस
ट्रैकिंग से मोटिवेशन।
बच्चों
और महिलाओं के लिए सुरक्षा
फीचर्स।
क्या करें, क्या न करें (सुझाव)
✔ स्मार्टवॉच
को लगातार 24 घंटे न पहनें।
✔ सोते
समय घड़ी उतारकर रखें।
✔ पसीना
या गंदगी जमने से बचाने के
लिए डिवाइस और स्ट्रैप को
साफ रखें।
✔ हेल्थ
रिपोर्ट्स को केवल गाइडलाइन
मानें, डॉक्टर की सलाह के
बिना उपचार न करें।
✔ बच्चों
को लंबे समय तक स्मार्टवॉच न
पहनाएँ।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक असर
स्मार्टवॉच
सिर्फ स्वास्थ्य नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित
कर रही है।
लोग
बातचीत के दौरान भी
बार-बार कलाई देखते रहते हैं।
फिटनेस
डेटा सोशल मीडिया पर शेयर करना
एक नई प्रतिस्पर्धा पैदा
कर रहा है।
यह
प्रतिस्पर्धा कई बार तनाव
और असंतोष का कारण बनती
है।
भविष्य की दिशा
टेक्नोलॉजी
कंपनियाँ लगातार यह दावा करती
हैं कि उनकी स्मार्टवॉच
सुरक्षित हैं और इनसे निकलने
वाला रेडिएशन बेहद कम है। भविष्य
में संभव है कि:
ऐसी
डिवाइस बनें जिनका रेडिएशन बिल्कुल न हो।
नींद
और स्वास्थ्य ट्रैकिंग के लिए अधिक
बायो-फ्रेंडली टेक्नोलॉजी आए।
मानसिक
स्वास्थ्य को ध्यान में
रखकर फीचर्स विकसित किए जाएँ।
निष्कर्ष
स्मार्टवॉच
निस्संदेह हमारी ज़िंदगी को आसान बनाती
है। यह हमें फिट
रहने की प्रेरणा देती
है और कई बार
गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत
भी देती है। लेकिन हर तकनीक की
तरह इसके भी नुकसान हैं।
लंबे
समय तक इसका लगातार
उपयोग हमारी त्वचा, नींद और मानसिक स्वास्थ्य
पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
बच्चों
और किशोरों के लिए यह
और भी संवेदनशील विषय
है।
ज़रूरी
है कि हम इसे
संतुलित रूप से इस्तेमाल करें
और इसके प्रति अति-निर्भर न बनें।
इसलिए
सही संदेश यही है – स्मार्टवॉच का उपयोग करें,
लेकिन समझदारी से।
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